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‘ढोल-थाली’ और ‘नॉन बायलॉजिकल’ बयान पर ज्योत्सना महंत घिरीं, विरोधियों ने पूछा—रेल मुद्दे पर सात साल में क्या हुआ ?

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कोरबा। कोरबा की सियासत में विकास की रफ्तार भले अपनी जगह हो, लेकिन राजनीतिक बयानों की एक्सप्रेस एक बार फिर फुल स्पीड में दौड़ पड़ी है। गुरुवार को तिलक भवन में आयोजित ‘प्रेस से मिलिए’ कार्यक्रम में सांसद ज्योत्सना महंत ने केंद्र सरकार और स्थानीय व्यवस्था पर सवाल उठाए। ‘नॉन बायलॉजिकल’ से लेकर ‘ढोल-थाली’ तक दिए गए उनके बयानों ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

सांसद ने कहा कि वे दिखावे और ढोलक-थाली बजाने की संस्कृति में विश्वास नहीं करतीं, बल्कि जनता के बीच रहकर चुपचाप काम करने में विश्वास रखती हैं। अब सियासी सवाल यह है कि अगर ढोल-थाली दिखावा है, तो फिर सात साल से रेल आंदोलन की राजनीति आखिर किस श्रेणी में आती है? कोरबा की जनता को आंदोलन की आवाज तो कई बार सुनाई दी, लेकिन अब जनता शायद यह भी जानना चाहती है कि उन आंदोलनों का हिसाब-किताब क्या रहा।

रेल सुविधाओं को लेकर सांसद ने फिर सड़क पर उतरने और आंदोलन करने की चेतावनी दी है। सुनने में लगा जैसे कोरबा की रेल राजनीति का अगला एपिसोड भी तैयार है। सवाल सिर्फ इतना है कि कहानी में नया क्या है ? मांगें पुरानी, आंदोलन की चेतावनी पुरानी और जनता के सवाल भी पुराने। ऐसे में विरोधियों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि सात साल की राजनीति में यदि रेल ही सबसे बड़ा मुद्दा रहा है, तो जनता के सामने अब तक की ठोस उपलब्धियों की सूची क्यों नहीं रखी जा रही?मेडिकल कॉलेज के निर्माण की धीमी गति पर सांसद ने सरकार को घेरा। यह सवाल जायज है कि काम की रफ्तार क्यों धीमी है, लेकिन राजनीति का दूसरा सवाल भी उतना ही स्वाभाविक है—जब विकास कार्यों की निगरानी और जनता की आवाज उठाना जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी है, तो अब तक इस मुद्दे पर हुई ठोस पहल और उसके नतीजे भी सार्वजनिक होने चाहिए।

कोरबा में हालत कुछ ऐसी है कि विकास के मुद्दे पीछे खड़े हैं और बयान आगे निकलकर दौड़ रहे हैं। कभी रेल आंदोलन की सीटी, कभी ढोल-थाली का तंज और अब ‘नॉन बायलॉजिकल’ की राजनीतिक गूंज। जनता के सामने मगर सवाल वही हैं—रेल सुविधाएं कब सुधरेंगी, मेडिकल कॉलेज कब रफ्तार पकड़ेगा और विकास के बड़े दावे जमीन पर कब दिखाई देंगे?सियासत में बयान देना आसान है, आंदोलन का ऐलान उससे भी आसान। मुश्किल है जनता के सामने यह बताना कि पिछले वर्षों में क्या हासिल हुआ। अब कोरबा की जनता शायद भाषणों की आवाज से ज्यादा काम की रफ्तार देखना चाहती है। क्योंकि पटरी पर राजनीति कितनी भी तेज दौड़े, जनता को आखिरकार विकास की ट्रेन ही चाहिए।

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