
धारा 165 का इस्तेमाल अभियोजन की कमी पूरी करने के लिए नहीं कर सकते जज, हाई कोर्ट ने 15 साल पुरानी सजा रद्द कर प्रताप सिंह को किया बरीबिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने गवाहों से सवाल-जवाब करने के दौरान ट्रायल कोर्ट की भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत न्यायाधीश को गवाहों से सवाल पूछने का व्यापक अधिकार है, लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल अभियोजन पक्ष की कमजोरियों को दूर करने या गवाह से आरोपी के खिलाफ कोई महत्वपूर्ण तथ्य कहलवाने के लिए नहीं किया जा सकता। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की पीठ ने पेंड्रा थाना क्षेत्र के ग्राम डोंगरिया निवासी प्रताप सिंह की दोषसिद्धि को रद्द करते हुए उसे संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। मामला वर्ष 2011 में उमराज गोंड की मौत से जुड़ा था। हाई कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश का उद्देश्य सत्य सामने लाना होना चाहिए, लेकिन सवाल इस तरह नहीं होने चाहिए कि गवाह दबाव, भ्रम या भय की स्थिति में आ जाए। 2011 में हुई थी घटनाअभियोजन के अनुसार 19 नवंबर 2011 की सुबह करीब पांच बजे उमराज गोंड और शिवनाथ गोंड के बीच विवाद हुआ था। आरोप था कि शिवनाथ अपने बेटे प्रताप सिंह को बुलाकर लाया और दोनों ने उमराज पर बांस की लाठियों से हमला किया। हमले में उमराज को गंभीर चोटें आईं और उसकी मौत हो गई।घटना की जानकारी सरपंच प्रदीप कुमार श्याम ने पुलिस को दी थी। इसके बाद पेंड्रा थाने में हत्या का मामला दर्ज किया गया था। ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी पांच साल की सजामामले की सुनवाई के बाद एडिशनल सेशन जज, पेंड्रा रोड ने 28 सितंबर 2011 को प्रताप सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 भाग-1 के तहत दोषी ठहराया था। उसे पांच वर्ष के सश्रम कारावास और एक लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई थी।प्रताप सिंह ने इसी फैसले के खिलाफ वर्ष 2011 में हाई कोर्ट में आपराधिक अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने 24 सितंबर 2026 को मामले का फैसला सुनाया। अधिकांश गवाहों ने अभियोजन का पूरी तरह समर्थन नहीं कियाअभियोजन की ओर से मामले में कुल आठ गवाह पेश किए गए थे। मृतक की पत्नी सूरजवती गोंड प्रमुख गवाह थीं। हाई कोर्ट ने उनके बयान का परीक्षण करते हुए पाया कि घटना शुरू होने के समय वह घर के अंदर थीं। लाठी चलने की आवाज सुनकर वह बाहर आईं, तब उनके पति जमीन पर पड़े थे।कोर्ट के अनुसार उनके बयान से यह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हुआ कि प्रताप सिंह ने ही उमराज पर हमला किया था। मामले के अन्य महत्वपूर्ण गवाहों में प्रदीप कुमार श्याम, रोहिणी प्रसाद, मुन्नी बाई, विनोद कुमार यादव और गणेश प्रसाद चौधरी शामिल थे। इनमें से कई गवाह अभियोजन के पक्ष में पूरी तरह नहीं रहे और उन्हें पक्षद्रोही घोषित किया गया। धारा 165 के तहत पूछे गए सवाल पर हाई कोर्ट की आपत्तिहाई कोर्ट ने विशेष रूप से ट्रायल कोर्ट द्वारा भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 165 के तहत पूछे गए सवालों की जांच की। कोर्ट ने पाया कि गवाह के सामान्य बयान में प्रताप सिंह की भूमिका स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई थी।ट्रायल कोर्ट के सवाल-जवाब के बाद गवाह के जवाब में प्रताप सिंह द्वारा उमराज की गर्दन पर लाठी मारने की बात सामने आई। हाई कोर्ट ने माना कि इस तरह के सवाल के जरिए अभियोजन के मामले में मौजूद महत्वपूर्ण कमी को पूरा नहीं किया जा सकता। जज अभियोजक या बचाव पक्ष के वकील की भूमिका नहीं निभा सकताहाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राम चंदर बनाम हरियाणा राज्य और स्टेट ऑफ राजस्थान बनाम एएनआई सहित अन्य फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि न्यायाधीश को सत्य सामने लाने के लिए आवश्यक सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन उसे किसी एक पक्ष की भूमिका में नहीं आना चाहिए।धारा 165 का उद्देश्य न्यायालय को प्रासंगिक तथ्यों तक पहुंचने में मदद करना है। इसका इस्तेमाल अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य में मौजूद कमी को भरने के लिए नहीं किया जा सकता। मेडिकल और अन्य साक्ष्यों पर भी सवालहाई कोर्ट ने मामले के मेडिकल और अन्य साक्ष्यों पर भी गौर किया। डॉक्टर ने यह पुष्टि नहीं की थी कि मृतक को लगी चोटें बरामद की गई लाठी से ही लगी थीं। वहीं अन्य गवाहों के बयान और कथित बरामदगी भी अभियोजन के मामले को निर्णायक रूप से स्थापित नहीं कर सके। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि सह-आरोपित शिवनाथ को इसी साक्ष्य के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा कि जब दोनों आरोपितों के खिलाफ साक्ष्य काफी हद तक समान हो, तो एक को दोषी और दूसरे को बरी करने के लिए स्पष्ट कानूनी आधार होना आवश्यक है। हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि और सजा रद्द कीसभी तथ्यों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने प्रताप सिंह के खिलाफ 28 सितंबर 2011 के दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने उसे धारा 304 भाग-1 के आरोप से बरी करते हुए संदेह का लाभ दिया।प्रताप सिंह पहले से जमानत पर था। कोर्ट ने उसके जमानत बंधपत्र को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 481 के तहत जारी रखने का निर्देश दिया।












