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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु बोलीं—मैं भी मांझी की बेटी हूं, आदिवासी समाज से मेरा गहरा जुड़ाव

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु बोलीं—मैं भी मांझी की बेटी हूं, आदिवासी समाज से मेरा गहरा जुड़ावजगदलपुर/रायपुर। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शुक्रवार को बस्तर के जगदलपुर स्थित सिरहासार भवन में आयोजित ऐतिहासिक मुरिया दरबार में आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था की सराहना की। उन्होंने कहा कि वह स्वयं आदिवासी संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी हैं। उन्होंने भावुक होकर कहा, “मैं भी आप लोगों में से एक हूं। मैं भी मांझी की बेटी हूं।”राष्ट्रपति ने कहा कि आदिवासी समाज ने पीढ़ियों से अपनी परंपराओं, सामाजिक नियमों और सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था को जीवित रखा है। यह व्यवस्था समाज में आपसी प्रेम, सद्भाव, सहयोग और शांति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।परिवार की परंपरा का किया उल्लेखमुरिया दरबार में आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों और पारंपरिक प्रमुखों को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मुर्मु ने अपने परिवार की पृष्ठभूमि का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उनके दादाजी और पिताजी मांझी थे। उनके भाई भी मांझी की जिम्मेदारी निभाते थे। उन्होंने कहा कि परिवार के सदस्यों के आज साथ नहीं होने के बावजूद आदिवासी समाज की संस्कृति और परंपराओं के प्रति उनका जुड़ाव आज भी गहरा है।राष्ट्रपति ने समाज के लोगों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित रखा है। गीत-संगीत, नृत्य, त्योहार और सामूहिक आयोजनों के माध्यम से आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट पहचान को बनाए हुए है।आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था की सराहनाराष्ट्रपति ने कहा कि समय के साथ शासन व्यवस्था और कानूनों में बदलाव आया है, लेकिन आदिवासी समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था आज भी महत्वपूर्ण बनी हुई है। समाज में प्रचलित नियम और परंपराएं लिखित संविधान की तरह किसी पुस्तक में दर्ज नहीं हैं, फिर भी लोग पीढ़ियों से उनका पालन करते आ रहे हैं।उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था का उद्देश्य समाज में सुख-शांति, प्रेम, सद्भाव और आपसी सहयोग को बनाए रखना है। आदिवासी समाज के लोग मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं, विवाह और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं तथा त्योहारों को सामूहिक रूप से मनाते हैं।मांझी और परगना व्यवस्था से विवादों के समाधान पर जोरराष्ट्रपति मुर्मु ने आदिवासी समाज की पारंपरिक न्याय व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि गांवों में मांझी और अन्य पारंपरिक प्रमुख सामाजिक समस्याओं के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।उन्होंने बताया कि परिवारों के बीच विवाद, जमीन-जायदाद से जुड़े मामले और आपसी मतभेद होने पर पारंपरिक रूप से मांझी की मदद ली जाती थी। मांझी गांव के लोगों को एकत्रित कर दोनों पक्षों की बात सुनते और आपसी सहमति से विवाद सुलझाने का प्रयास करते थे।उन्होंने पीड़, परगना और देश परगना जैसी पारंपरिक संस्थाओं का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, गांव स्तर पर समस्या का समाधान नहीं होने पर उसे उच्च पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के समक्ष रखा जाता था। इस तरह सामूहिक विचार-विमर्श और सहमति के माध्यम से समस्याओं को हल करने की परंपरा विकसित हुई।कोर्ट-कचहरी में समय और पैसा बर्बाद नहीं करने की अपीलराष्ट्रपति ने कहा कि कई विवादों के समाधान में आधुनिक न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत लंबा समय लग सकता है। ऐसे मामलों में लोगों का समय और पैसा खर्च होता है। उन्होंने समाज के लोगों से अपील की कि जहां संभव हो और कानून इसकी अनुमति देता हो, वहां आपसी बातचीत और सहमति से विवादों का समाधान करने का प्रयास करें।उन्होंने मुरिया दरबार जैसी ऐतिहासिक परंपराओं को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही कहा कि पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में संवाद, सामूहिक जिम्मेदारी और आपसी विश्वास का विशेष महत्व है।नक्सलवाद के खिलाफ एकजुट रहने का आह्वानराष्ट्रपति मुर्मु ने नक्सलवाद की चुनौती का उल्लेख करते हुए आदिवासी समाज से एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि समाज के लोगों को किसी के बहकावे में आने के बजाय अपने गांव, समाज और भविष्य के बारे में सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए।उन्होंने कहा कि किसी भी चुनौती का सामना सामूहिक प्रयासों से बेहतर तरीके से किया जा सकता है। समाज में एकता और आपसी विश्वास मजबूत रहने से नकारात्मक गतिविधियों का सामना करने में मदद मिलती है।बच्चों की शिक्षा और संस्कृति के संरक्षण पर जोरराष्ट्रपति ने आदिवासी समाज से बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने की अपील की। उन्होंने कहा कि बदलते समय के साथ सोच में सकारात्मक बदलाव लाना और विकास के नए अवसरों को अपनाना जरूरी है। हालांकि, विकास की दिशा में आगे बढ़ते हुए अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक पहचान को नहीं भूलना चाहिए।उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा और सांस्कृतिक विरासत एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। समाज के लोग बच्चों को शिक्षित करें और साथ ही उन्हें अपनी परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक मूल्यों से भी परिचित कराएं।राष्ट्रपति ने आदिवासी समाज के विकास और कल्याण के लिए सरकार की ओर से सहयोग जारी रहने की बात कही। उन्होंने समाज के लोगों से शिक्षा, सामाजिक एकता और विकास के माध्यम से आगे बढ़ने का आह्वान किया।मुरिया दरबार की परंपरा को जीवित रखने की अपीलअपने संबोधन के अंत में राष्ट्रपति ने मुरिया दरबार जैसी ऐतिहासिक परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की पहचान उसकी संस्कृति, परंपराओं और सामूहिक मूल्यों से होती है।उन्होंने बस्तर के आदिवासी समाज से मिले स्नेह और सम्मान के लिए आभार व्यक्त किया। राष्ट्रपति का संदेश था कि समाज आधुनिक विकास को अपनाते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहे और आपसी प्रेम, सद्भाव तथा एकता को मजबूत बनाए रखे

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